मेंडल के 3 प्रथम और प्रमुख नियम क्या है | Mendel’s Law in Hindi

हम सभी जानते हैं कि अमरूद के बीज अंकुरित होकर अमरूद का पौधा ही पैदा करते हैं। इसी प्रकार गाय से गाय और मनुष्य से मनुष्य का बच्चा पैदा होता है, न कि किसी अन्य प्राणी का। प्रकृति का यह सार्वभौमिक नियम है।

संतति की इस प्रवृति को जिसमें वे अपने पैदा करने वाले के लक्षण या गुण प्राप्त करते हैं, उसे आनुवंशिकता या हेरिडिटी (Heredity) कहा जाता है। विज्ञान की जिस शाखा में आनुवंशिकता तथा जनकों और उनकी संतति के बीच विविधता का अध्ययन किया जाता है, उसे आनुवंशिकी (जेनेटिक्स- Genetics) कहते हैं।

आनुवंशिकता बहुत से प्रश्नों का उत्तर देती है। जैसे एक ही माता-पिता की दो संतति (बच्चे) अलग-अलग क्यों दिखाई देती है। कुछ लोगों की स्किन काली तथा कुछ लोगों की हल्के रंग की क्यों होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो एक ही प्रकार के जीवों में भिन्नता क्यों पाई जाती है।

जब भी किसी परिवार में बच्चे का जन्म होता है, तो सबसे पहले रिश्तेदार शिशु की आँखों, कान, नाक, नक्श, बालों का रंग, चेहरा आदि का माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी आदि से मिलान करने लगते हैं।

इस प्रकार की समानताएँ और विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी ट्रांसफर होने वाले जींस के कारण है। यह हमारे दादा-दादी से हमारे माता-पिता को और हमारे माता-पिता से हमें प्राप्त होती हैं।

आनुवंशिकी विज्ञान का आरंभ 1900 के आस-पास हुआ था। इस समय मेंडल के नियमों की दोबारा से खोज की गई। आनुवंशिकी (Genetics) शब्द का सबसे पहले प्रयोग विलियम बेटसन ने 1905 में किया था।

इस विज्ञान में आनुवंशिकता और विविधता का अध्ययन किया जाता है। आनुवंशिकता से हमारा तात्पर्य उन traits या लक्षणों से है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अर्थात माता-पिता से संतान में स्थानांतरित होते रहते हैं।

ये लक्षण किसी भी प्राणी के लिए निश्चित होते हैं। आनुवंशिकी विविधताएँ लैंगिक प्रजनन एवं उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप जीवों में उत्पन्न होती है। ये विविधताएँ संतान में माता-पिता से वंशागत प्राप्त होती है।

इसी प्रकार वातावरणीय विभिन्नताएँ वे होती है, जो वातावरण के कारण होती है। अतः वे माता-पिता से संतान में ट्रांसफर नहीं होती है। आनुवंशिकी की स्थापना मेंडल की खोजों से हुई थी।

मेंडल का जीवन परिचय

Gregor Johann Mendel kaun the

ग्रेगर जॉन मेण्डल (Gregor John Mendel; 1822-1884) के कार्यों के परिणामस्वरूप आधुनिक आनुवंशिकी का जन्म हुआ । इन्हें ‘आनुवंशिकी का पिता’ (Father of Genetics) भी कहा जाता हैं।

इनका जन्म 22 जुलाई सन् 1822 में मोराविया नामक गाँव (जो की अब चेकोस्लोवाकिया में हैं) में एक साधारण माली परिवार में हुआ था। मेण्डल ने सन् 1842 में दर्शन शास्त्र (Philosophy) में दो वर्षीय कोर्स को उत्तीर्ण किया।

इसके बाद वे 1843 में ऑस्ट्रिया के ब्रूनो शहर के धार्मिक मठ में पादरी के रूप में कार्य करने लगे । यहाँ पर इन्हें ग्रेगर की उपाधि से नवाजा गया। इसके बाद मेंडल 1881 में वियना गए जहाँ उन्होंने 3 वर्षों तक वियना विश्वविद्यालय में गणित एवं प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन किया।

यह अध्ययन उनके द्वारा बाद में किए गए आनुवंशिकी विषय पर किये गए शोध कार्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। 1854 से 1864 तक वे पुनः ब्रूनो शहर में लौट आये तथा वहां पर मॉडर्न स्कूल में अध्यापन का कार्य किया।

मेण्डल ने अध्यापन के दौरान 1857 से 1865 तक लगभग 8 वर्षों तक मठ के उद्यान में उद्यान मटर के पौधों पर महत्वपूर्ण प्रयोग किये। इन प्रयोगों के आधार पर उन्होंने वंशानुगति की इकाइयों की धारणा का प्रस्ताव दिया।

उसके अनुसार प्रत्येक जनक से समान संख्या में ऐसी ईकाइयां वंशानुगत होती हैं जो की संतान में सामान्य एवं विशिष्ट लक्षणों के लिए जिम्मेदार होती हैं। उन्होंने अपने 30,000 मटर के पौधों पर किये गये प्रयोगों से प्राप्त परिणामों को ब्रौन सोसाइटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के समक्ष 8 मार्च, 1865 को प्रस्तुत किये।

फिर अपने शोध कार्य को 1866 में सोसाइटी की वार्षिक पत्रिका में Experiments in Plant Hybridization नामक शीर्षक से शोध पत्र प्रकाशित किया। उनका मूल शोध पत्र जर्मन भाषा में “Versuche uber Pflanzenhybriden” नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था । मेण्डल के प्रयोगों के परिणामों के आधार पर आनुवंशिकता के नियम बनाये गये जिन्हें मेण्डलवाद के नाम से जाना जाता हैं।

लगभग 34 वर्षों तक यह शोध कार्य उपेक्षित रहा लेकिन 1900 में हॉलैंड के ह्यूगो डी व्रिज (Hugo De Vries), जर्मनी के कार्ल कोरेंस (Karl Correns) एवं ऑस्ट्रिया के एरिक वोन शेरमार्क (Eric Von Tschermark) के अलग अलग प्रयोगों में मेण्डल के जैसे ही परिणाम प्राप्त हुए जिससे मेण्डल के भूले हुए कार्यों को प्रमाणिकता मिली।

मेंडल के अध्ययन

मेंडल के नियम हमें आनुवंशिकता का ज्ञान देते हैं। मेंडल ने सबसे पहले अपने अध्ययन के लिए मटर के का चयन किया था। उनका अपने अध्ययन के लिए मटर का चयन करने के कई कारण थे, जो इस प्रकार से हैं-

  • इसे सरलता से उद्यान में अथवा किसी गमले में भी उगाया जा सकता है।
  • इस पौधे का जीवनकाल बहुत ही अल्प होता है तथा यह अपना जीवन काल 01 वर्ष में पूरा कर लेता है। इसके फलस्वरूप इसकी कई पीढ़ियों का अध्ययन अल्प समय में आसानी से किया जा सकता है।
  • इसके पुष्प द्विलिंगी होते हैं व इनमें स्वपरागण पाया जाता है, जिससे पौधों में गुणों की शुद्धता कई पीढ़ियों तक बनी रहती है।
  • इसमें पर- परागण भी हो सकता है।
  • मटर के पौधों में अनेक विपर्यासी लक्षण (Contrasting characters) पाए जाते हैं।

लक्षणों का चयन

मेण्डल ने मटर के पौधे में पाए जाने वाले 34 विपर्यासी लक्षणों में से 07 जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का अपने अध्ययन के लिए चयन किया। ये लक्षण निम्नानुसार थे:-

क्र. सं.लक्षणअप्रभावीप्रभावी
1पादप की ऊंचाईबौनेलंबे
2पुष्पों की स्थितिशीर्षस्थकक्षीय
3फली का आकारसंकुचितफुली हुई
4फली का रंगपीलाहरा
5बीज का आकारझुर्रीदारगोल
6बीज कवच का रंगसफ़ेदधूसर
7बीजपत्र का रंगहारापीला

 

मेंडल ने इन सातों जोड़ी लक्षणों का अध्ययन कर यह पाया कि ये लक्षण आनुवांशिक रूप से शुद्ध थे। इसका आशय यह है, कि सभी लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी अपरिवर्तित रहता है। अर्थात अगर हम छोटे पौधे उगाएँगे तो आगे जाकर छोटे पौधे ही उगेंगे।

मेंडल की संकरण तकनीक

Hybridization Experiment of Mendel

मेण्डल के प्रयोगों को समझने से पहले उनकी संकरण तकनीक को जानना आवश्यक है। उन्होंने निम्न संकरण तकनीक का प्रयोग किया-

  • मटर एक स्वपरागण वाला पादप है, क्योंकि इसके पुष्प की संरचना इस प्रकार की होती है जिससे इसके पराग उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं और स्वपरागण / स्वनिषेचन करते हैं। स्वपरागण को रोकने के लिए मेण्डल, पुष्प की कली खोलकर वर्तिका को परिपक्क होने से पहले ही उसके पुंकेसर (Stamen) को हटा देते थे। इस प्रक्रिया को विपुंसन कहा जाता है।
  • इस बधिया किये गए अथवा जनद नाशित पुष्प के वर्तिका पर वे ऐसे पौधे के पुष्प के परागकण को रख देते थे। जिसे उन्हें संकरण में दूसरे जनक के रूप में प्रयोग में लेना होता था।
  • कृत्रिम रूप से निषेचित इन पुष्पों का कीटों द्वारा अथवा अन्य पौधों द्वारा निषेचन रोकने हेतु इन पर थैलिया बांध दी जाती थी।
  • इस प्रकार प्राप्त बीजों से बने पौधों में विभिन्न विपर्यासी लक्षणों जैसे तना, पुष्प, फली व बीजों का अध्ययन किया जाता था।

यदि वे संकरण के बाद द्वितीय संकर पीढ़ी का अध्ययन करना चाहते थे तो वे इन फूलों को सामान्य प्रक्रिया से स्व-निषेचन करने देते थे। प्रयोग में लिए गए पौधों को जनकीय पीढ़ी कहा गया जिसे P (Parent) से प्रदर्शित किया गया।

जनक पौधों से प्राप्त प्रथम संतति पीढ़ी को प्रथम संकरण संतति कहते हैं, जिसे F1 (First filial generation) से प्रदर्शित किया जाता हैं। प्रथम संतानीय पीढ़ी (F1) के स्वनिषेचन से उत्पन्न पौधों को द्वितीय संकरण संतति कहते हैं जिसे F2, शब्द से व्यक्त करते हैं।

इनकी उत्पत्ति पर वे उसका प्रेक्षण करते थे। वे विपर्यासी लक्षणों वाले पौधों की संख्या की गणना करते थे तथा उन्होंने इन आंकड़ों की सहायता से इन प्रेक्षित आंकड़ों के सैद्धांतिक स्पष्टीकरण का सूत्रण किया।

इन प्रयोगों के परिणामों के सैद्धांतिक स्पष्टीकरण को ही अब मेण्डल के वंशागति के नियमों (Mendel’s laws of inheritance) के नाम से जाना जाता हैं। मेण्डल ने अपने प्रयोगों में कारक (Factor) शब्द का प्रयोग किया। वर्तमान में ये कारक ही जीन कहलाते हैं।

मेण्डल ने उपरोक्त संकरण विधि द्वारा मटर के विभिन्न 07 विपर्यासी लक्षणों में से एक या अधिक लक्षणों को साथ लेकर निम्न प्रयोग किये तथा आनुवंशिकी के नियमों को प्रतिपादित किया-

  1. एक संकर संकरण (Monohybrid cross)
  2. द्विसंकर संकरण (Di-hybrid cross)
  3. बहु संकर संकरण (Polyhybrid cross)

1. एक संकर संकरण (Monohybrid cross)

मेण्डल ने वंशागति के अध्ययन के लिए विपरीत लक्षणों के एक युग्म विकल्पी (Alleles) के मध्य संकरण करवाया। इस हेतु उन्होंने शुद्ध रूप से लम्बे व शुद्ध बौने पौधों के मध्य संकरण करवाया। प्रभावी लक्षण लम्बे को T से तथा अप्रभावी लक्षण बौने को t से प्रदर्शित किया।

Monohybrid cross

इस संकरण से प्राप्त बीजों को उगाने से प्राप्त F1 पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे प्राप्त हुए। इस संकरण में मेण्डल ने यह देखा कि F1 पीढ़ी में प्राप्त सभी पौधे अपने लम्बे जनक के समान थे, इनमें से कोई बौना नहीं था।

इसी प्रकार के परिणाम अन्य विपर्यासी लक्षणों में संकरण करवाने पर प्राप्त हुए। इन प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकला की F1 पीढ़ी में दोनों विपर्यासी लक्षणों में से केवल एक लक्षण ही प्रकट हो पाता है, दूसरा लक्षण प्रकट नहीं हो पाता है।

इसके बाद F1 पीढ़ी के पौधों में स्व निषेचन करवाकर बीज प्राप्त किये जिसे उसने F2 पीढ़ी कहा। F2 पीढ़ी में लम्बे व बौने दोनों प्रकार के पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए। इस 3:1 के अनुपात को एक संकर लक्षण प्रारूपिक अनुपात (Monohybrid Phenotypic Ratio) कहा जाता है।

इनमें से बौने पौधों के बीजों को वापस उगाने व उनके स्व निषेचन से बौने पौधे ही प्राप्त होते हैं तथा लम्बे पौधों के बीजों को वापस उगाने स्वनिषेचन से पुन: लम्बे व बौने पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए।

जिनका जी प्रारूपिक (Genotype ) अनुपात देखे तो यह 1:2:1 (1TT:2Tt:1tt) का होता हैं अर्थात लम्बे पौधों में समयुग्मी TT तथा विषमयुग्मी Tt जीन है जबकि बौने पौधों में केवल समयुग्मी tt जीन है।

इस प्रकार एक संकर संकरण का लक्षण प्ररुप अनुपात 3 : 1 तथा जीनी प्ररुप अनुपात 1 : 2 : 1 होता है।

मेण्डल द्वारा किये गए प्रयोगों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है ‘:-

मटर के पौधों में लम्बाई का लक्षण एक जोड़ी कारकों (लम्बे व बौनेपन ) अथवा युग्मविकल्पियों (Alleles) द्वारा नियंत्रित होता है । इन कारकों को वर्तमान में जीन कहा जाता है। इस युग्म का एक कारक पिता से (Paternal ) व दूसरा कारक माता से (Maternal) होता है जो कि निषेचन के बाद एक साथ आ जाते हैं |

F1 संतति में जो कारक अपने गुण को प्रकट करता है उसे प्रभावी कारक (Dominant) तथा वह कारक जो अपने गुण को प्रकट नहीं कर पाता है उसे अप्रभावी (Recessive) कारक कहा जाता है ।

2. द्वि संकर संकरण (Di-Hybrid cross)

जब संकरण दो जोड़ी कारकों अथवा युग्मविकल्पियों के मध्य करवाया जाता है तो इसे द्विसंकर संकरण कहते हैं। मेण्डल ने दो जोड़ी विपर्यासी लक्षणों जैसे पीले व गोल समयुग्मी बीज (Yellow&Round, YYRR) वाले पौधों का हरे तथा झुर्रीदार समयुग्मी (Green and Wrinkled, yyrr) वाले मटर के पौधों से संकरण करवाया।

Di-Hybrid cross

इनमें संकरण करवाने पर F1 पीढ़ी में सभी पौधे पीले व गोल बीजों (YyRr) वाले उत्पन्न हुए। मटर के पौधे में बीज का पीला रंग बीज के हरे रंग पर तथा गोल बीज की आकृति झुर्रीदार पर प्रभावी है।

F1 पीढ़ी के पौधों से उत्पन्न बीजों को वापस उगाने पर उनमें स्वनिषेचन / स्व- परागण द्वारा F2 पीढ़ी (द्वितीय संतानीय पीढ़ी) में चार प्रकार के पौधे प्राप्त होते हैं जिनका समलक्षणी अनुपात 9:3:3:1 प्राप्त हुआ।

  • 9/16 में दोनों प्रभावी लक्षण अर्थात- पीले व गोल बीज
  • 3/16 में एक प्रभावी तथा एक अप्रभावी – पीले व झुर्रीदार बीज
  • 3/16 में एक अप्रभावी तथा दूसरा प्रभावी- हरे व गोल बीज
  • 1/16 में दोनों अप्रभावी – हरे व झुर्रीदार बीज

F2 पीढ़ी का समजीनी अनुपात 1:2:2:4:1:2:1:2:1 आता है। इस प्रयोग के आधार पर मेंडल के “स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम” (Law of Independent Assortment) का प्रतिपादन किया गया।

मेण्डल की सफलता के कारण

  • मेण्डल ने अपने प्रयोगों में स्पष्ट रूप से दिखने वाले 07 विपर्यासी लक्षणों को ही शामिल किया तथा एक समय में केवल एक ही लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया। इन सातों विपर्यासी लक्षणों की वंशागति को नियंत्रण करने वाले कारक अथवा जीन सात विभिन्न गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं जिसके कारण मेण्डल अत्यधिक भाग्यशाली रहे कि वे सहलग्रता के प्रक्रम से बच गए।
  • मेण्डल ने पूर्ण रूप से शुद्ध गुण वाले (समयुग्मजी) पौधों को ही प्रयोग में लिया।
  • मेण्डल ने अपने प्रयोग F2 एवं F3 पीढ़ी तक ही किये तथा अपने प्रयोगों के परिणामों का विधिवत लेखा रखा।

मेण्डल के नियम (Mendel’s laws of inheritance)

मेण्डल ने अपने प्रयोगों तथा उनके द्वारा प्राप्त परिणामों से वंशागति के महत्वपूर्ण नियमों का प्रतिपादन किया जिन्हें मेण्डल के वंशागति के नियम कहते हैं । ये निम्नानुसार हैं:-

1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

मेण्डल द्वारा किये गये मटर के एक संकरण प्रयोगों से प्राप्त F1 पीढ़ी में केवल एक प्रकार के लक्षण वाले पौधें ही प्राप्त हुए। यदि लम्बे पौधे का बौने पौधे से संकरण करवाया जाये तो केवल लम्बे पौधे प्राप्त होते हैं ।

अर्थात् लम्बाई वाले लक्षण ने बौने वाले लक्षण को मटर के पौधे में प्रकट नहीं होने दिया । अत: लम्बाई वाले लक्षण को प्रभावी (Dominant character) एवं बौनेपन वाले लक्षण को अप्रभावी लक्षण (Recessive) कहा गया ।

इसी प्रयोग के परिणाम को मेण्डल ने ” प्रभाविता का नियम ” कहा। यह नियम जीवों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है । मनुष्य में मंदबुद्धि, मधुमेह, वर्णान्धता आदि आनुवंशिक रोगों के जीन अप्रभावी होते है। प्रभावी जीन की उपस्थिति में यह प्रकट नहीं हो पाते है जिसके फलस्वरूप मनुष्य सामान्य होता है ।

2. विसंयोजन का नियम (Law of Segregation)

इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम अथवा विसंयोजन का नियम (Law of Purity of gametes or Law of Segregation) भी कहते हैं। मेण्डल ने अपने एक संकर संकरण के प्रयोगों के परिणाम के आधार पर युग्मकों की शुद्धता का नियम अथवा विसंयोजन का नियम प्रतिपादित किया।

एक संकर संकरण के प्रयोगों में F1 पीढ़ी में एक समान, संकर लम्बे पौधे प्राप्त होते हैं जबकि F2 पीढ़ी में स्वनिषेचन के पश्चात जनक पौधों के समान लम्बे व बौने पौधे प्राप्त होते हैं। F1 पीढ़ी में लम्बे व बौनेपन के कारक एक साथ रहते हुए भी एक दूसरे के साथ सम्मिश्रित नहीं होते हैं अर्थात एक पर दूसरे का प्रभाव नहीं पड़ता है।

ये कारक F2 पीढ़ी में एक दूसरे से पृथक होते हुए 75% लम्बे पौधे तथा 25% बौने पौधे बनाते हैं । इस प्रकार युग्मक अपनी शुद्धता बनाये रखते हैं, इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम कहते हैं।

व युग्मक निर्माण के समय दोनों युग्मविकल्पी (Tt) एक दूसरे से विसंयोजित (Segregate) होकर अलग-अलग युग्मकों में पहुँच जाते हैं व F2 पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण, बौनापन भी प्रकट हो जाता है।

अत: इस प्रकार युग्मकों में प्रभावी तथा अप्रभावी कारकों का विसंयोजन या पृथक होना मेडल का विसंयोजन का नियम कहलाता है।

विसंयोजन के नियम का महत्व

  • इस नियम से जीन संकल्पना की पुष्टि होती है।
  • जीन वंशागति की इकाई है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लक्षणों को संचारित करती है।
  • जीवों में प्रत्येक लक्षण जीन द्वारा नियंत्रित होता है।
  • प्रत्येक जीन के दो युग्म विकल्पी होते हैं जो एक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का नियंत्रण करते हैं।
  • जीन के युग्म विकल्पी एक साथ रहते हुए भी समिश्रित नहीं होते हैं।
  • युग्मक निर्माण के दौरान युग्म विकल्पी एक दूसरे से पृथक पृथक होकर अलग-अलग युग्मकों में जाते हैं।

3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

यह नियम द्विसंकर तथा उच्च स्तर के संकरणों पर लागू होता है। एक संकर संकरण पर लागू नहीं होता है। मेण्डल द्वारा किये गए द्विसंकर तथा उच्च संकरण के प्रयोगों में जब दो या दो से अधिक विपर्यासी लक्षणों के मध्य संकरण करवाया जाता है तो प्रथम F1, पीढ़ी में प्रभावी लक्षण वाले संयोग प्राप्त होते हैं।

परन्तु जब इनसे प्राप्त बीजों को उगाया जाता है एवं उनमें स्वनिषेचन करवाया जाता है तो वे एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से संतति में प्रकट होते हैं। अर्थात एक लक्षण की वंशागत का दूसरे लक्षण की उपस्थिति से किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता है।

इसी को स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम कहते हैं । इस नियम के अनुसार युग्मविकल्पी के प्रत्येक युग्म के सदस्य न केवल पृथक होते हैं परन्तु विभिन्न लक्षणों के युग्मविकल्पी एक दूसरे के प्रति स्वतंत्र रूप से व्यवहार करते हैं । अर्थात एक से अधिक विपर्यासी लक्षणों के जीन एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वतंत्र रूप से लक्षणों को ले जाते हैं।

मेण्डल ने शुद्ध पीले व गोल बीज (YYRR) वाले पौधों का हरे व झुर्रीदार बीज (yyrr) वाले पौधों से संकरण करवाया तथा यह पाया की F1 पीढ़ी में पीले व गोल बीज (YyRr) वाले पौधे प्राप्त हुए। F1 पीढ़ी वाले पौधों में स्वपरागण के बाद चार प्रकार के पौधे निम्नानुसार अनुपात में प्राप्त हुए:-

  • पीले व गोल बीज = 9
  • पीले व झुर्रीदार बीज = 3
  • हरे व गोल बीज = 3
  • हरे व झुर्रीदार बीज = 1

उपरोक्त प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि पीले व गोल बीज एवं हरे व झुर्रीदार बीज वाले पौधों के पैतृक संयोग के अलावा दो नए संयोग पीले व झुर्रीदार बीज व हरे व गोल बीज वाले पौधे भी प्राप्त होते हैं, अर्थात ये कारक अथवा युग्मविकल्पी एक दूसरे को प्रभावित किये बिना युग्मकों के निर्माण में स्वतंत्र रूप से अपव्यूहित होते हैं। इसी को मेण्डल का स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम कहते हैं ।

मेण्डल के नियमों का महत्व

मेण्डल ने अपने प्रयोगों द्वारा पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए सभी नियमों तथा सिद्धान्तों को नकार दिया क्योंकि इनमें से अधिकतर मात्र काल्पनिक थे जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था।

शुरुआत में मेण्डल के कार्यों को मान्यता नहीं मिली परन्तु उनकी मृत्यु के लगभग 34 वर्षो बाद सन् 1900 में जब हॉलैंड के वैज्ञानिक ह्यूगो डी व्रिज, जर्मनी के कार्ल कोरेंस एवं ऑस्ट्रिया के एरिक वॉन शेरमार्क ने मेण्डल के किये गए कार्य के समान परिणाम प्रस्तुत किये तो मेण्डल के कार्यों को महत्व दिया गया।

इनके द्वारा किये गए कार्यो के बाद ही आगे शोध कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को नयी दिशा मिली। इसी आधार पर आनुवंशिकी के नए प्रयोग एवं नवीन खोजें हुई। मेण्डल को इस आनुवंशिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) माना गया।

मेण्डल के प्रयोगों के आधार पर वैज्ञानिकों ने संकरण प्रक्रिया द्वारा विभिन्न सजीवों में प्रभावी एवं अप्रभावी लक्षणों का पता लगाया है। संकरण विधि द्वारा विभिन्न वंशों में पाए जाने वाले अच्छे लक्षणों को एक वंश में साथ साथ लाया गया है।

मेण्डल के नियमों को उपयोग में लेते हुए रोग प्रतिरोधक, विपरीत परिस्थितियों में बने रहने की क्षमता, फूलों या फलों का अधिक बड़ा व सुन्दर तथा उच्च उत्पादन वाली फसलों को विकसित किया गया। इसी प्रकार गाय, भैंस, बकरी तथा मुर्गी की नस्लों को भी सुधारा जा सकता है।

इनकी नस्लों में अधिक दुग्ध उत्पादन एवं तीव्र गति से प्रजनन क्षमता विकसित की गई। अनेक प्राणियों में कुछ आनुवांशिक रोग या दोषपूर्ण लक्षण पाए जाते हैं, उनका निराकरण भी जीन लेवल पर मेंडल के नियमों की सहायता से ही हो सकता है।

इन नियमों के द्वारा संकर संतति में उत्पन्न होने वाले नए संयोगों तथा उनकी आवर्ती के बारे में भी पहले से ही ज्ञात किया जा सकता है।

प्रतीप संकरण एवं परीक्षण संकरण क्या है?

प्रतीप संकरण एवं परीक्षण संकरण इस प्रकार से हैं-

1. संकर पूर्वज संकरण या प्रतीप संकरण

एक संकर संकरण से प्राप्त F1 पीढ़ी के पौधों या प्राणी का संकरण यदि दोनों जनकों में से किसी एक जनक के साथ करवाया जाता है तो वह संकरण संकर पूर्वज संकरण अथवा प्रतीप संकरण कहलाता है ।

2. परीक्षण संकरण

F1 पीढ़ी के किसी पादप अथवा किसी भी सजातीय अज्ञात जीन प्रारुपी पौधे अथवा प्राणी के साथ समयुग्मजी (शुद्ध) अप्रभावी जनक का संकरण करवाया जाता है तो इसे परीक्षण संकरण कहते हैं। इस संकरण से यह ज्ञात किया जाता है, कि यह अज्ञात पौधा या प्राणी समयुग्मजी है अथवा विषमयुग्मजी।

मेंडल के अध्ययन में यूज होने वाले शब्दों की व्याख्या कुछ इस प्रकार से हैं-

  • कारक (Factor): एक विशेष लक्षण की वंशागति व अभिव्यक्ति के लिये उत्तरदायी एकक अथवा कारक। वर्तमान समय में कारक को जीन कहा जाता है।
  • जीन (Gene) :- DNA अणु का विशेष खण्ड जो एक विशिष्ट गुण की वंशागत व अभिव्यक्ति को निर्धारित करता है।
  • युग्मविकल्पी या एलील या ऐलीलोमार्फ (Alleles or Allelomorphs):- ऐलील किसी भी कारक अथवा जीन के दो या दो से अधिक विकल्पी रूप। उदाहरण के लिये मटर के पौधे में बीज को आकृति प्रदान करने वाले जीन के दो विकल्पी रुप हो सकते हैं: गोल (R) व झुर्रीदार (r)। गोल व झुर्रीदार बीजों के लिये दोनों जीन एक दूसरे के ऐलील हैं। इसी प्रकार मनुष्यों में रक्त समूह को नियंत्रित करने वाले जीन के तीन ऐलील IA, IB तथा I0 (I=इम्यूनोहीमोग्लोबीन जीन ) है। समजाती गुणसूत्र में एलील समान स्थान पर रहते हैं।
  • लक्षण या विशेषक (Trait): यह अभिव्यक्त लक्षण है, उदाहरण फूल का रंग, बीज की आकृति आदि।
  • प्रभावी गुणः किसी गुण के दो विकल्पी रुपों में से जो रुप विषमयुग्मजी जीव के F1 संकर में अभिव्यक्त होता है उसे प्रभावी गुण (प्रभावी ऐलील) कहते हैं और इस घटना को प्रभाविता कहते हैं। उदाहरणत: Tt से युक्त जीव में T ऊँचान अथवा लम्बा होना स्वयं को प्रकट करता है और t (बौनापन) व्यक्त नहीं हो सकता इसलिये T प्रभावी जीन है तथा लम्बापन प्रभावी गुण है।
  • अप्रभावी गुणः एक गुण के दो विकल्पी रुपों में से जो रूप F1 संकर में अभिव्यक्त नहीं होता, उसे अप्रभावी गुण कहते हैं, अप्रभावी केवल समयुग्मजी स्थिति (उदाहरणतया tt) में गुण अभिव्यक्त होता है ।
  • जीनप्ररुप (Genotype): एक व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना को, जो नर या मादा अपने जनकों से वंशानुक्रम में प्राप्त करते हैं, जीन प्ररुप ( जीनोटाइप) कहलाते है, उदाहरणत: विशुद्ध गोल बीज वाले जनक मटर के पौधे का जीनोटाइप RR है।
  • लक्षणप्ररुप (Phenotype): किसी जीव के किसी एक या अधिक गुणों की बाह्य अभिव्यक्ति को लक्षणप्ररुप (फीनोटाइप) कहते हैं, उदाहरण बीजों के लिये गोल या झुर्रीदार आकृति फीनोटाइप है।
  • समयुग्मजी: किसी गुण के लिये एक समान ऐलील वाला जीव समयुग्मजी कहलाता है, उदाहरणतया RR ऐलील युक्त पादप, बीज की आकृति के लिये समयुग्मजी है।
  • विषमयुग्मजी: किसी गुण के लिये एक जीव के दोनों ऐलील असमान होने की स्थिति को विषमयुग्मजी कहते हैं । उदाहरणतया Rr ऐलील वाला पादप बीज के आकार के लिए विषमयुग्मजी होता है।
  • जनक पीढ़ियाँ: पहले संकरण में प्रयुक्त माता-पिता जनक पीढ़ी (P) को निरूपित करते हैं।
  • F1 पीढ़ी:- दो जनकों (माता-पिता P ) के बीच संकरण से उत्पन्न संतति को प्रथम या F1 पीढ़ी कहते हैं।
  • F2 पीढ़ी: F1 पीढ़ी में स्वपरागण या अन्तर्जनन के परिणामस्वरूप प्राप्त संतति पीढ़ी द्वितीय संतानीय पीढ़ी कहलाती है।
  • एकसंकर क्रॉस (Monohybrid cross):- इस प्रकार के संकरण जिसमें एक ही जोड़ी लक्षणों को लिया जाता है एक संकर क्रॉस कहलाता है व F1 संतति को संकर (Hybrid) कहते हैं। F1 पीढ़ी में स्वपरागण से F2 पीढ़ी में 3 : 1 (प्रभावी : अप्रभावी) का लक्षण प्ररूप अनुपात प्राप्त होता है।
  • द्विसंकर क्रॉस (Dihybrid cross): जब दो जोड़ी विपर्यासी लक्षणों को अध्ययन करने के लिए माता-पिता में क्रॉस कराया जाता है तो इसे द्विसंकर क्रॉस कहते हैं । F2 पीढी में द्विसंकर क्रॉस से प्राप्त फीनोटाइप अनुपात को द्विसंकर लक्षणप्ररुपी अनुपात कहते हैं।
  • संकरण (Hybridization): विभिन्न प्रजातियों के जनक जीवों के बीच क्रॉस (निषेचन) को संकरण कहते हैं।
  • परीक्षण क्रॉस (Test cross): F1 अप्रभावी गुणों वाले जनक के बीच क्रॉस को परीक्षण क्रॉस कहते हैं । यदि F2 संतति विषमयुग्मजी हो तो परीक्षण क्रॉस के परिणामस्वरूप 1:1 का अनुपात पाया जाता है।
  • व्युत्क्रम क्रॉस (Reciprocal cross): इस प्रकार के क्रॉस में माता-पिता (जनकों) का लिंग उत्क्रमित कर दिया जाता है अर्थात यदि पहले क्रॉस में पिता बौना व माँ लम्बी हो तब व्युत्क्रम क्रॉस में माँ बौनी व पिता लंबे लिए जाएंगे।

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निष्कर्ष:

तो ये थे मेंडेल के 3 प्रथम नियम क्या है, हम आशा करते है की इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आपको मेंडेल के सभी नियमों के बारे में पूरी जानकारी मिल गयी होगी।

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